कथा सार एवं संपूर्ण कथा Katha Saar & Story
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
एकादशी के दिन विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक भगवान् शालिग्राम, भगवान् श्री सत्यनारायण और भगवान् श्री कृष्ण की पूजा, उपासना और व्रत की सनातन हिन्दू वैदिक परंपरा है । एकादशी सभी व्रतों में सबसे उत्तम माना जाता है, हर महीने दो एकादशी होती है और तुलसी माता की विशेष पूजा होती है । सामान्य हिंदू पंचांग वर्ष में कुल 24 एकादशी होती हैं, और अधिक मास (अतिरिक्त चंद्र माह) को मिलाकर कुल 26 एकादशी होती है ।इन सभी एकादशी में भी देव उठावनी एकादशी का सबसे अधिक महत्व है ।
एकादशी की पौराणिक कथा
सत्ययुग की पौराणिक कथा के अनुसार, सत्ययुग में 'मुर' नाम का एक भयानक राक्षस हुआ था । उसने अपनी अपार और मायावी शक्तियों से देवराज इंद्र और अन्य देवी देवताओं को परास्त कर दिया था । राक्षस मुर से हारने के बाद सभी देवी-देवता भगवान विष्णु के पास पहुँचे । भगवान विष्णु ने सभी के आग्रह पर मुर राक्षस से युद्ध किया और ये युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा । युद्ध लम्बा होने के कारण भगवान विष्णु थककर विश्राम करने के लिए बद्रिकाश्रम में एक गुफा में चले गए। मुर राक्षस वहाँ भी पहुँच गया और उसने भगवान को सोते हुए देखकर उन्हें मारने का प्रयास किया । तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य और तेजवान कन्या प्रकट हुई । उस कन्या ने मुर राक्षस को युद्ध के लिये ललकारा और भीषण युद्ध के बाद मुर राक्षस का वध कर दिया । जब भगवान विष्णु नींद से जागे, तो उन्होंने उस कन्या को देखा और प्रसन्न होकर उसका नाम 'एकादशी' रखा क्योंकि वह एकादशी तिथि को उत्पन्न हुई थी । भगवान नारायण ने उसे वरदान दिया कि जो भी मनुष्य एकादशी के दिन एकादशी का व्रत रखेगा, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे और उसे अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी ।
एकादशी का नाम मास पक्ष “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
अन्न का त्याग: एकादशी के दिन चावल या किसी भी प्रकार का अनाज खाना वर्जित माना जाता है ।
फलाहार या उपवास: भक्त अपनी क्षमता के अनुसार निर्जला (बिना पानी), जलहार या फलाहार व्रत रखते हैं
विष्णु आराधना: दिनभर भगवान विष्णु की पूजा, 'विष्णु सहस्रनाम' का पाठ और हरि नाम का संकीर्तन किया जाता है।
पारण: व्रत का समापन अगले दिन (द्वादशी तिथि पर) सूर्योदय के बाद ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देकर और भोजन करके किया जाता है।
1.कामदा एकादशी चैत्र शुक्ल
2.वरूथिनी एकादशी वैशाख कृष्ण
3.मोहिनी एकादशी वैशाख शुक्ल
4.अपरा एकादशी ज्येष्ठ कृष्ण
5.निर्जला एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल
6.योगिनी एकादशी आषाढ़ कृष्ण
7.देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल
8.कामिका एकादशी श्रावण कृष्ण
19.पुत्रदा एकादशी श्रावण शुक्ल
10.अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण
11.परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल
12.इंदिरा एकादशी आश्विन कृष्ण
13.पापांकुशा एकादशी आश्विन शुक्ल
14.रमा एकादशी कार्तिक कृष्ण
15.देव प्रबोधिनी एकादशी कार्तिक शुक्ल
16.उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण
17.मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष शुक्ल
18.सफला एकादशी पौष कृष्ण
19.पुत्रदा एकादशी पौष शुक्ल
20.षटतिला एकादशी माघ कृष्ण
21.जया एकादशी माघ शुक्ल
22.विजया एकादशी फाल्गुन कृष्ण
23.आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल
24.पापमोचिनी एकादशी चैत्र कृष्ण
25.पद्मिनी एकादशी अधिक मास शुक्ल
26.परमा एकादशी अधिक मास कृष्ण
पद्म पुराण के अनुसार एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस दिन व्रत एवं कथा श्रवण करने से जीव समस्त पापों से मुक्त होकर भक्ति पद प्राप्त करता है।भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी व्रत का महात्म्य बताते हुए कहा कि यह व्रत आत्म-संयम और भक्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन है।
व्रत विधि Vrat Vidhi
दशमी तिथि की रात्रि से सात्विक आचरण रखें। एकादशी के दिन अन्न का त्याग कर फलाहार ग्रहण करें और हरि-कीर्तन एवं कथा श्रवण करें।
महत्व Significance
एकादशी व्रत का मुख्य उद्देश्य मन और इंद्रियों का नियमन तथा भगवद्-चिंता में समय व्यतीत करना है।
फल एवं लाभ Spiritual Benefits
आत्मिक बल, स्वास्थ्य लाभ और प्रभु भक्ति की प्राप्ति होती है।