हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे ।
हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।।
त्रेता युग में श्री हरि ने भगवान् श्री राम का मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार लेने के बाद द्वापर युग में भगवान् श्री नारायण ने कृष्ण के रूप अपना सम्पूर्ण स्वरुप दिखाया । श्री कृष्ण सोलह कलाओं में निपुर्ण और सोलह नाम कलि के बुरे प्रभावों का नाश करते हैं । भगवान् श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवनकाल जन्म से लेकर बैकुंठ जाने तक लीलाओं से भरा है ।
भगवान् श्री कृष्ण के मथुरा, वृन्दावन, द्वारका, हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र की लीलाओं का वर्णन करते-करते अक्षर समाप्त हो सकते है पर माधव के महात्मय की लीला गाथा का वर्णन समाप्त नहीं हो सकता । भगवान् श्री कृष्ण ने अपने जन्म के छठवें दिन ही राक्षसी पूतना का वध कर दिया था । तृणावर्त, बकासुर, अघासुर, वत्सासुर ,धेनुकासुर, केशी असुर, व्योमासुर और किशोरावस्था में मथुरा पहुँचने के बाद उन्होंने अपने मामा कंस का भी वध किया था ।
बाल्यकाल में ही भगवान् श्री कृष्ण ने यमुना नदी में रहने वाले विषैले कालिया नाग का भी मानमर्दन किया था । इंद्र का घमंड तोड़ने के लिए बाल्यकाल में ही भगवान् हरि स्वरुप कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया था । भगवान् श्री कृष्ण ने अपनी अनन्य लीला दिखा कर जरासंध, कालयमन का वध करवा दिया था । द्वापर युग में एक महायुद्ध हुआ जिसे धर्मयुद्ध "महाभारत" कहा गया यह युद्ध श्री कृष्ण ने अपनी सगी बुआ कुंती के बच्चों को उनका राज-पाठ वापस दिलाने के लिए रचा था । श्री कृष्ण अपने फुफेरे भाइयों पांडवों के साथ थे इसका करण यह था कि धर्मराज युधिष्ठिर, महाबली भीम, धनुर्धर अर्जुन, नकुल और सहदेव और उनकी पत्नी द्रौपदी धर्म के साथ थे । जबकि पांडवों के पितामह भीष्म, ताऊ धृतराष्ट्र और उनके सौ पुत्र जिसमें दुर्योधन और दुशासन अधर्म के साथ थे ।
भगवान श्री कृष्ण सनातन हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के आठवें स्वरुप में पूर्ण अवतार और जगत के पालनहार माने जाते हैं । भगवान् विष्णु ने द्वापर युग में अत्याचारी राजा कंस को मारने, कौरव-पांडव के बीच अधर्म पर धर्म की पताका लहराने एवं ब्रज की और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की महारानी राधा रानी के लिए अवतार लिया था ।
एक ओर जहाँ श्री कृष्ण अधर्मियों के लिए छलिया थे वहीं ब्रज की लीला में वो वृषभान दुलारी राधा रानी, ब्रजवासियों और गोपियों के लिए प्रेम का अद्भुत प्रतीक है । भगवान् श्री कृष्ण ब्रज की कुञ्ज और निकुंज लीला में सभी के लाडले और दुलारे हैं । कृष्ण और राधा की रास लीला निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण की उच्चतम पराकाष्ठा का उदाहरण है । माता यशोदा और देवकी के साथ अपनी लीला में माता और पुत्र के बीच वात्सल्य का ऐसा प्रतीक हैं जो युगों-युगों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में किसी ने न देखा और न ही किसी से सुना । अपने बाल्यकाल के प्रिय मित्र सुदामा के साथ मित्र भाव दिखाकर भगवान् कृष्ण ने मित्रता का सबसे सर्वश्रेष्ठ उदाहरण समाज को दिया है । एक राजा के रूप में अपनी प्रजा को स्वर्ण की नगरी द्वारका बसाकर सर्वश्रेष्ठ राजा होने का उदाहरण दिया है । द्वारका लीला में भगवान कृष्ण की आठ प्रमुख पटरानियां रुक्मणी, जामवंती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रवृदां, नग्नजिति, रोहिणी और लक्ष्मणा थीं, लेकिन उन्होंने रुक्मणि (माता लक्ष्मी का अवतार) का नाम सदा ही पत्नी के रूप में लिया । सहित आठ पटरानियों महामानव के रूप में श्री हरि ने प्रारब्ध के कर्मों का पश्चाताप करने के लिए जरा नाम के शिकारी के हाँथो निजधाम (वैकुंठ) जाने की लीला की ।