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श्री गणेशाय नमः
Vrat Kathaye

करवा चौथ का व्रत पर्व

करवा चौथ के दिन पत्नी अपने पति की लम्बी आयु और सौभाग्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं । इस व्रत में चन्द्र देव, भगवान् शिव, पार्वती और गणेश जी की पूजा का विधान है

करवा चौथ की कथा

कथा सार एवं संपूर्ण कथा Katha Saar & Story


करवा चौथ का व्रत चंद्र देव (चन्द्रमा) को अर्घ देकर निर्जला व्रत तोड़ने की परंपरा से जुड़ा हुआ है । लेकिन इस पावन पर्व के दिन चंद्रदेव, शिव-शक्ति और गणेश भगवान् का आशीर्वाद पाने का विशेष अवसर होता है । इस दिन पत्नी अपने पति की लम्बे जीवन और अखंड सौभाग्य के लिए कठोर निर्जला व्रत रखती हैं । यह व्रत रात में चन्द्र देव को देखकर ही तोड़ा जाता है इस दिन सुहागन स्त्री द्वारा की गई पूजा सतीत्व, प्रेम, सुख और समर्पण का प्रतीक होती है । इसलिए, करवा चौथ का व्रत केवल पति की दीर्घायु के लिए नहीं, बल्कि सौभाग्य, समृद्धि और गृह-शांति के लिए भी किया जाता है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विशेष रूप से करवा माता की पूजा होती है । करवा माता एक हिन्दू धार्मिक संस्कृति की एक महान पतिव्रता स्त्री थीं, जिनके नाम पर ही 'करवा चौथ' का व्रत और त्यौहार मनाया जाता है । पति के पुकारने पर करवा वहां पहुंची और अपने सतीत्व व तपोबल से सूती धागे (या कपास के धागे) से मगरमच्छ को एक पेड़ से बांध दिया ।


प्राचीन काल में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के पास रहती थी। एक दिन जब उनके पति नदी में स्नान कर रहे थे, तब एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया । अपने पति के प्राण बचाने और मगरमच्छ को सजा दिलाने के लिए करवा यमराज के पास पहुंची । करवा के सतीत्व और भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने उनके पति को लंबी आयु का वरदान दिया और मगरमच्छ को नरक भेजा दिया ।



करवा चौथ की कथा व्रत महिमा


एक साहूकार था। उसके सात बेटे थे और एक बेटी थी। वह सातों भाईयों की प्यारी बहन थी। एक साथ ही बैठकर वह खाना खाते थे। एक दिन कार्तिक की चौथ आई तो उसकी बहन ने करवाचौथ का व्रत रखा। सारे भाई भोजन करने आए और अपनी बहन से बोले आ बहन तू भी खाना खा ले। उनकी मां बोली आज यह खाना नहीं खाएगी। इसका करवाचौथ का व्रत है। जब चांद निकलेगा तभी यह खाना खाएगी। तो उसके भाइयों ने छल कपट से जंगल में आग जलाकर छलनी में से चांद दिखा दिया तो वह अपनी भाभियों से बोली चला भाभी चांद निकल आया है। अर्घ दे दो। तो उसकी भाभियां बोली यह तो तेरा चांद निकला है। हमारा तो रात को निकलेगा। यह सुनकर भाईयों के कहने से उसने चांद को अरग दे दिया और खाना खाने बैठ गई। पहला टुकड़ा तोड़ा बाल निकला, जूसरा टुकड़ा तोड़ा छींक मारी, तीसरा टुकड़ा तोड़ने के लिए जैसे ही बैठी राजा के घर से बुलावा आ गया कि राजा का लड़का बीमार है जल्दी भेजो ।


मां ने लड़की के पहनने के लिए तीन बार संदूक खोला तीनों बार सफेद रंग की ही साड़ी निकली। अब वह सफेद कपड़े पहनकर ही ससुराल गई और मां ले लकड़ी के पल्ले में एक सोने का सिक्का डाल दिया और बोली रास्ते में जो भी मिले पैर पड़ती जाइयो जो तुझे सुहाग की आशीष दे उसे सोने का सिक्का दे देना और पल्ले को गांठ लगा लेना। अब उसे रास्ते में जो कोई भी मिला सबके पैर पड़ी पर किसी ने भी सुहाग का आशीष नहीं दी। अब वह ससुराल में आई तो दरवाजे पर छोटी ननद खड़ी थी। वह उसके पैर पड़ी तो ननद बोली- सीली हो, सपूती हो, सात बेटों की मां हो, मेरे भाई का सुख देख। अब उसने सोने का सिक्का ननद को देकर पल्ले में गांठ मार ली। उसके बाद वह अंदर आई। आकर देखा की उसका पति मरा पड़ा था। अब वह उसे लेकर एक कोठरी में पड़ी रही। एक साल तक उसकी सेवा की। उसकी सास बांदी के साथ बची कुची रोटी भेज देती। इस प्रकार उसने एक साल तक अपने पति की सेवा की ।


सालभर बाद करवाचौथ का व्रत आया। सारी पड़ोसनों ने नहा धोकर करवाचौथ का व्रत रखा। सबने सिर धोकर हाथों में मेहंदी लगाई। चूड़ियां पहनी। वह सब कुछ देखती रही। एक पड़ोसन ने कहा कि तू भी करवाचौथ का व्रत रख ले। तब वह बोले मैं कैसे करूं। तो वह बोली चौथ माता की कृपा से सब ठीक हो जाएगा। उसके कहने से उसने भी व्रत रख लिया। थोड़ी देर के बाद करवा बेचने वाली आई। करवे लो री करवे लो। भाईयो की प्यारी करवे लो। ऐ करवे वाली मुझे भी करवा दे जा। वह कहने लगी मेरी दूसरी बहन आएगी वह तुझे करवा देगी। इस तरह पांच बहने आकर चली गई। पर किसी ने भी करवा नहीं दिया। फिर छठि बहन आई तो वह भी बोली की मेरी सातवी बहन आएगी तो वह तुझे करवा देगी। बस तू रास्ते में कांटे बिखेरकर रख देना। जब भी खूब चिल्लाते हुए आएगी तो उसके पैर में कांटे चुभ जाएंगे। तब तू सूई लेकर बैठ जाना और उसके पैर पकड़कर छोड़ना मत। और उसके पैर से कांटा निकाल देना। तो वह तुझे आशीर्वाद देगी। भाई जियो, साई जियो। जब वह तुम्हे आशीर्वाद देगी तो तुम उससे करना मांग लेना। तब वह तुझे करवा देकर जाएगी। फिर तू अजमन करना जिससे तेरा पति ठीक हो जाए ।


अब उसने वैसे ही किया। सारे रास्ते में कांटे बिछा दिए। जब करवे वाली करवा लेकर आई तो उसके पैरों में कांटे चुभ गए। उसके बाद उसने करवा वाली के पैर पकड़कर कांटा निकाल दिया। तो उसने आशीर्वाद दिया। तब वह बोली तूने मुझे आशीर्वाद दियाहै तो करवे भी देकर जा। तो वह बोली - तूने तो मुझे ठग लिया। यह कहकर उसने उसे करवा दे दिया। अब वह करवा लेकर उसने उजमन की तैयारी की। व्रत रखा। राजा का लड़का भी ठोक हो गया और बोला मैं बहुत सोया हूं। तब वह बोली सोए नहीं मुझे बारह महीने हो गए आपकी सेवा करते करते। फिर उसने चौथ माता का उजमन अच्छा तरह से किया। अब उसने चौथ माता की कहानी सुनी। अब वह दोनों चौपड़ खेलने लग गए इतने में उसकी बांदी तेल की पली और गुड़ की डली लेकर आ गई। दोनों को खेलते देखकर सासू से जाकर बोली महलों में खूब रौनक है। बहू चौपड़ सार खेल रही है। इतना सुनते ही सासू देखने के लिए आई। दोनों को देखकर बहुत खुश हुई। बहु ने सासू के पैर दबाए और सासू बोली बहू सच सच बता तूने क्या किया? उसने सारा हाल अपनी सासू को बताया। तो राजा ने सारे शहर में ढिंढोरा पिटवाया की अपने पति का सुरक्षा के लिए सभी बहने करवा चौथ का व्रत रखें। पहले करवे को अपने पिहर में जाकर उजमन करें। हे चौथ माता जैसा राजा के लड़के को जीवनदान दिया है वैसे सब किसी को देना। कहानी सुनते समय कटोरी में चावल लें। चांद को अरग देते समय ऐसा सात बार बोलें-


चन्दा ए चन्द्रावलिए चन्दा आया बार में, उठ सुहागन अरग दें, मैं बैठी खी बाट में।

काहें का तेरा कंडला काहे का तेरा हार, सोने का मेरा कंडला जगमोतियन का हार।

कहां बसे तेरा पेवड़ा कहां बसे ससुराल। आम तवे मेरा पेवड़ा नीम तले ससुराल।