ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।
सनातन हिंदू वैदिक परंपरा में दुर्गा को महादेवी माना जाता है जो परम शक्तिशाली हैं और शिव का सम्पूर्ण तेज और ऊर्जा उनमें विद्यमान है जो शिव की शक्ति है और पार्वती है । देवी दुर्गा का उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत और मार्कंडेय पुराण में भी मिलता है, जो मानव द्वारा रचित प्राचीन वेद-ग्रन्थ है । देवी दुर्गा की अनंत महिमा दुर्गा सप्तशती के 700 में मिलती है जो उनके युद्धों का वर्णन करती है । देवी दुर्गा अपना प्रबल तेज लिये हुये नौ रूपों से संसार के मनुष्यो, देवी देवताओं और सृष्टि की रक्षा करती है यही दानवों-असुरों का संहार करती है ।दुर्गा के तीन महत्वपूर्ण रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी एवं महाकाली जो मनुष्यों को ज्ञान-बुद्धि, धन-संपत्ति और शक्ति-वैभव प्रदान करती है । महिषासुर, शुम्भ-निशुंम्भ, मधु-कैटभ और रक्तबीज जैसे दानवों-असुरों का मर्दन करने के लिये देवी दुर्गा ने प्रचंड रूप धारण किया था जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया था ।
शक्तिशाली राक्षस महिषासुर के वध की कथा :
सतयुग (या प्राचीन कल्प/मन्वंतर) में महिषासुर नाम का एक भयंकर राक्षस था । महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे ऐसा शक्तिशाली वरदान दिया कि कोई भी मनुष्य, देवता या पशु उसे मार नहीं सकता था । केवल एक स्त्री ही उसका वध कर सकती थी । महिषासुर ने वरदान पाकर स्वयं को अजेय मानकर तीनो लोकों में उत्पात मचाना शुरू कर दिया । उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और हर जगह अराजकता फैला दी साथ ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव देवताओं ने उससे लड़ने की कोशिश की, लेकिन वे सभी असफल रहे ।
उसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर अपनी शक्तियों से एक महान तेज उत्पन्न किया, उस प्रकाश से असाधारण शक्ति और सौंदर्य वाली एक देवी प्रकट हुईं । उनके दस हाथ थे, जिनमें से प्रत्येक में एक अलग देवता द्वारा प्रदत्त शस्त्र थे । वे एक शक्तिशाली सिंह पर सवार थीं, यही देवी दुर्गा थीं जिनका शिव के तेज से मुख बना, श्री हरि विष्णु के तेज से भुजाएं बनीं, ब्रह्मा जी के तेज से चरण बने । इसके अतिरिक्त चंद्रमा, इंद्र, वरुण, यमराज, अग्नि और सूर्य आदि सभी देवताओं के तेज से उनके अन्य अंगों और शक्तियों का सृजन हुआ ।
जब महिषासुर को पता चला कि एक स्त्री उसे चुनौती देने आई है, तो वह हँस पड़ा । उसने देवी दुर्गा को विवाह का प्रस्ताव भी भेजा । दुर्गा ने शांत भाव से उत्तर दिया, "मैं महादेवी हूँ यदि तुम आत्मसमर्पण नहीं करोगे, तो मैं तुम्हारा नाश कर दूँगी ।" उसके बाद महिषासुर बौखला गया और उसने युद्ध के लिये देवी दुर्गा को ललकारना शुरू किया देवी क्रोध से भरी हुई थी और महिषासुर का वध करने के लिये अवतरित हुई थी । देवी दुर्गा ने ऐसा ललकारा के तीनो लोकों में असहनीय वायु चलने लगी, पृथ्वी डोलने लगी, समुद्र में उफान असाधारण हो गया और पातळ लोक से कठोर पीड़ादायक अग्नि निकलने लगी ।
युद्ध नौ दिन और नौ रात तक चला, मायावी महिषासुर कभी भैंस, कभी हाथी, कभी मनुष्य का रूप धारण करके दुर्गा को धोखा देने की कोशिश करता रहा लेकिन दुर्गा उग्र और शांत भाव से लड़ती रहीं दसवें दिन, उन्होंने महिषासुर का वध किया और तीनों लोकों में शांति आ गई और सम्पूर्ण जगत उनका गुणगान करने लगा । इसी उपलक्ष में हम चैत्र मास और शरद ऋतु के आगमन पर नौ दिन देवी की पूजा करते है एवं रामनवी और दशहरा (विजयदशमी ) का उत्सव मानते हैं ।
नवरात्रि पर्व पर देवी दुर्गा के पूजे जाने वाले नौ रूप इस प्रकार हैं :
1. शैलपुत्री - हिमालय की पुत्री। वह नई शुरुआत और असीम शक्ति का प्रतीक हैं।
2. ब्रह्मचारिणी - भक्ति और तपस्या की देवी। वे अनुशासन और धैर्य की शिक्षा देती हैं।
3.चंद्रघंटा - अर्धचंद्र वाली योद्धा। वह सभी भय को दूर करती है और साहस प्रदान करती है।
4.कुष्मांडा - ब्रह्मांड की सृष्टिकर्ता। वह ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत हैं।
5.स्कंदमाता - भगवान कार्तिकेय की माता। वे प्रखर मातृ प्रेम का प्रतीक हैं।
6.कात्यायनी - योद्धाओं की देवी। वह निर्भीक कर्म का प्रतीक हैं।
7.कालरात्रि - सबसे अंधकारमय और उग्र रूप। वह सभी अंधकार और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है।
8.महागौरी - तेजस्वी और शांत देवी। वह पवित्रता, कृपा और क्षमा का प्रतीक हैं।
9.सिद्धिदात्री - सभी अलौकिक शक्तियों की देवी। वे भक्तों को आध्यात्मिक पूर्णता का आशीर्वाद देती हैं।