Lord Ganesha Loader
श्री गणेशाय नमः
सुन्दरकाण्ड

सुन्दरकाण्ड की महिमा

"सुन्दरकाण्ड " श्री राम चरित मानस का एक ऐसा अध्याय है जिसमें राम के सेवक हनुमान जी की विजय, उनके बल, बुद्धि और पराक्रम का वर्णन किया गया है ।

कीर्तन धारा 13 September 2026
सुन्दरकाण्ड की महिमा

सुन्दरकाण्ड की महिमा

सीता माता को रावण ने लंका की अशोक वाटिका में रखा था । लंका तीन प्रमुख पर्वत सुबैल, नील और सुंदर पर्वत से घिरा था उसमें एक पर्वत था सुंदर जिसमें अशोक वाटिका थी । सुंदर पर्वत पर हनुमान जी ने माता सीता से भेंट की इसलिए इसे सुन्दरकाण्ड कहा गया । यह श्री राम चरित मानस का महत्वपूर्ण अध्याय है । इस काण्ड/अध्याय में सीता माता का पता लगा और भगवान् राम का सन्देश सीता माता तक पहुँचा ।

दोहा:

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुधि निधान।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥


अर्थात : तुम (हनुमान जी) बल और बुद्धि के भंडार हो, इसलिए तुम श्रीरामजी का सारा कार्य सिद्ध करोगे । यह आशीर्वाद देकर जब लंकिनी चली गई, तब हनुमानजी हर्षित होकर लंका की ओर आगे बढ़े ।

दोहा:

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥

आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥


अर्थात : जब हनुमान जी ने माता सीता का पता लगा लिया और माता सीता को विश्वास दिला दिया कि उन्हें प्रभु राम ने ही भेजा है और राम जी की भेजी हुई अंगूठी दिखाई । उन्होंने माता सीता को वि‌श्वास दिलाया कि प्रभु राम उन्हें बहुत जल्द ले जाएंगे, तो माता सीता ने हनुमान जी को वरदान दिया । इस चौपाई में उसी का वर्णन किया गया है । भक्ति, प्रताप, तेज और बल से भरी हुई हनुमान जी की वाणी सुनकर सीता जी के मन में सन्तोष उत्पन्न हुआ । सीता माता ने श्री राम जी का प्रिय जानकर उनको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ ।


दोहा:

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥


अर्थात : हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणोंके खजाने होओ । श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें । 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गये ।


दोहा:

बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥


अर्थात : हनुमानजीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा-हे माता! अब में कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है ।


सुन्दरकाण्ड अध्याय में ही लंका दहन का वर्णन है । जब हनुमान जी की पूँछ में रावण ने आग लगवाई तो हनुमान जी ने रावण की सोने की लंका को जलाकर राख कर दिया ।


दोहा:

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥24॥

अर्थात : मैं (रावण कहता है) सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर की ममता पूँछ पर होती है । अतः तेल में कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछ में बाँधकर फिर आग लगा दो ।


दोहा:

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥

जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥

अर्थात : साधु के अपमान का यह फल है कि नगर, अनाथ के नगर की तरह जल रहा है । हनुमान्‌जी ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला । एक विभीषण का घर नहीं जलाया ।