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श्री गणेशाय नमः
भगवान शिव की महिमा
DIVINE PRESENCE

शिव शंकर शम्भू महादेव एक ओंकार

हिन्दू सनातन धर्म में भगवान् शिव के प्रति वैदिक आस्था यह है कि शिव का स्वरूप मुख्य रूप से रुद्र के रूप में वर्णित है और उनकी शक्ति पार्वती है |

1 Mantra

"ॐ नमः शिवाय" हिन्दू सनातन धर्म में भगवान् शिव के प्रति वैदिक आस्था यह है कि शिव का स्वरूप मुख्य रूप से रुद्र के रूप में वर्णित है । जिन्हें वेद, ग्रंथ, पुराणों और उपनिषदों में प्रकृति की और ब्रह्मांड की शक्तिशाली तथा आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) शक्तियों का प्रतीक माना गया है । भगवान् शिव का उनकी आदिशक्ति अर्थात माता पार्वती के साथ एकाकार (अर्धनारीश्वर) होना एक संयोग नहीं बल्कि पूरी सृष्टि को संतुलित करने के लिये है ।


ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥


शिव अनादि हैं इसका अर्थ यह है कि शिव का न कोई आरंभ है और न ही अंत । शिव जिनके शीष पर चंद्रमा, गले में सर्प, हाथ में त्रिशूल और डमरू, और पूरे शरीर पर भस्म सुशोभित है । शिव सगुण भी हैं और निर्गुण भी उन्हें दोनों ही रूपों में पूजा जाता है, शिव निराकार भी हैं और शिवलिंग के रूप में साकार भी हैं । सनातन हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान शिव को प्रथम योगी यानी 'आदियोगी' माना जाता है । हिन्दू धर्म ग्रंथों में शिव जी को आदिनाथ या आदियोगी भी कहा जाता है, जो योग और आध्यात्मिकता के प्रमुख स्रोत हैं । भगवान् शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान और प्रलय का प्रतीक है, जो मनुष्य के अहंकार और बुराइयों का नाश करता है ।

भगवान् शिव की स्तुति और उपासना ऐसी है कि उन्हें साधारण से साधारण मनुष्य, देवता, असुर और दानव कोई भी भक्ति मार्ग से प्रसन्न कर सकता है । भगवान् शिव की उपासना करने से संसार के हर कष्ट, रोग, व्याधि और दरिद्रता दूर हो जाती है जिनकी पत्नी देवी पार्वती (सती, उमा, दुर्गा और काली उन्हीं के विभिन्न रूप हैं) । पुत्र: भगवान कार्तिकेय (स्कंद) और भगवान गणेश हैं, जिनका वाहन नंदी है ।


शिव की काशी :


पुराणों के अनुसार भगवान् शिव का मुख्य निवास कैलाश पर्वत पर है और भगवान् स्यंभू होकर पृथ्वी पर शिवलिंग रूप में अलग-अलग स्थानों पर वास् करते है । शिव के त्रिशूल के अग्रभाग भाग में काशी नगरी टिकी है जहाँ माता गंगा नदी उत्तरायणी बहती है ।


शिव की उत्पत्ति:


भगवान शिव अजन्में हैं वे स्वयंभू हैं । लेकिन वैदिक पुराणों में शिव की उत्पत्ति का विवरण मिलता है । विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए जबकि शिव भगवान विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न हुये हैं ऐसा वर्णित है । विष्णु पुराण के अनुसार विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं ।


वहीं विष्णु पुराण में शिव के जन्म की वर्णित कथा वर्णित है, जिसमें भगवान शिव के बाल रूप का वर्णन है । विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्माण्ड रचईता ब्रह्मा जी को एक बालक की जरूरत थी । उन्होंने इसके लिए घोर तपस्या की तब अचानक विष्णु जी ने उनकी गोद में रोते हुए बालक शिव को प्रकट कर दिया । ब्रह्मा जी ने बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने कहा कि उसका कोई नाम नहीं है इसलिए वह रो रहा है ।


तब ब्रह्मा जी ने शिव का नाम ‘रूद्र’ रखा जिसका अर्थ होता है ‘रोने वाला’। शिव तब भी चुप नहीं हुए। इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया पर उनको नाम अच्छा नहीं लगा और वे फिर भी चुप नहीं हुए । इस तरह बालक को चुप कराने के लिए ब्रह्मा जी ने 8 नाम दिए और शिव 8 नामों (रूद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव) से जाने गए। शिव पुराण के अनुसार यह नाम पृथ्वी पर लिखे गए थे । ब्रह्मा जी ने जैसे ही बालक को 'शिव' कहकर सम्बोधित किया तो वह बालक शांत हो गया । समुद्र मंथन के समय विष (हलाहल) निकला जिससे पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया । भगवान शिव को सृष्टि के कल्याण के लिये संसार का सबसे वषैला विष पीना पड़ा जिसके कारण उनका गला नीला पड़ गया था, जिससे बाद उनका नाम नीलकंठ पड़ा ।


भगवान शिव स्वयंभू होकर 12 ज्योतिर्लिंगों के स्वरूपों में पृथ्वी पर वास करते हैं ।

ज्योतिर्लिंगों के नाम :


1-सोमनाथ (ॐ सोमनाथाय नमः)

2-मल्लिकार्जुन (ॐ मल्लिकार्जुनाय नमः)

3-महाकालेश्वर (ॐ महाकालेश्वराय नमः)

4-ओम्कारेश्वर (ॐ ओम्कारेश्वराय नमः)

5-वैद्यनाथ (ॐ वैद्यनाथाय नमः)

6-भीमाशंकर (ॐ भीमाशङ्कराय नमः)

7-रामेश्वर (ॐ रामेश्वराय नमः)

8-नागेश्वर (ॐ नागेश्वराय नमः)

9-विश्वनाथ (ॐ विश्वनाथाय नमः)

10-त्र्यम्बकेश्वर (ॐ त्र्यम्बकेश्वराय नमः)

11-केदारनाथ (ॐ केदारनाथाय नमः)

12-घृष्णेश्वर (ॐ घृष्णेश्वराय नमः)