रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।
राम का अर्थ: “रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः अर्थात्, वह परम तत्व जिसमें योगी और सिद्ध पुरुष ध्यान के माध्यम से रमण करते हैं (लीन रहते हैं) और आनंद प्राप्त करते हैं, वही 'राम' है।” कण-कण में वास: आध्यात्मिक रूप से राम उस चेतना या शक्ति का नाम है जो सृष्टि के हर कण में व्याप्त है।
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
भगवान् श्री राम के जनम के समय चैत्र (मधु मास) का पवित्र महीना था, चैत्र माह की नवमी तिथि थी, शुक्ल पक्ष था और श्री नारायण भगवान का अतिप्रिय 'अभिजित् मुहूर्त' था । मध्यकाल दोपहर का समय था, न तो बहुत अधिक सर्दी थी और न ही तेज धूप (गर्मी) थी । वह अत्यंत पवित्र समय सभी लोकों को शांति और विश्राम देने वाला था।
कितने भी शब्द, अलंकार, छंद, चौपाई, दोहा, प्रसंग आदि बना लें फिर भी श्री हरि अवतारी भगवान् श्री राम की व्याख्या नहीं की जा सकती । इसीलिए सदा से ही ये कहा जाता है -
हरि अनंत हरि कथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए ॥
राम-नाम का आश्रय लिए बिना जो मनुष्य जीवन में मोक्ष की आशा करते हैं या धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों परमार्थों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं वे मानो बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़ कर आकाश में चढ़ जाना चाहते हैं । इसका आशय यह है कि जिस प्रकार पानी की बूँदों को पकड़ कर कोई भी आकाश में नहीं चढ़ सकता वैसे ही राम नाम के बिना कोई भी परमार्थ और मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता ।
राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस ।
बरषत वारिद-बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास ॥
आस्था यही है कि श्री राम में ममता और सब संसार में समता है, जिस मनुष्य का किसी और के प्रति राग, द्वेष, दोष और दुःख का भाव नहीं है, श्री राम के ऐसे भक्त को सदा ही भव सागर से पार हो चुके होते हैं । भगवान राम का अवतार इस पृथ्वी पर सिर्फ रावण का वध करने के लिए नहीं हुआ था । सीता अपने राम से पृथक नहीं है क्योकि सीता और राम एक आत्मा, एक शरीर और एक ही रूप है ।
रावण अपने अहंकार में इतना चूर था कि वो एकाकार स्वरुप को देख ही नहीं पा रहा था । सीता उसके लिए सीरम सामान्य स्तर भर थी और राम एक वनवासी । सीता तो लंका दशानन का काल बनकर गयी थी, राम ने तो बस उस बड़े अहंकारी का अंत करने के लिए माया भेजी थी । भगवान श्री हरि ने श्री राम का मानव रूप लेकर समाज को यह बताया कि भगवान की कृपा से परम शक्तियाँ पाकर यदि कोई भी अधर्म के पथ पर चलेगा तो उसक विनाश निश्चित है ।
भगवान राम ने अपने पिता दशरथ को दिया वचन निभाया, अपनी माता कैकेयी को आश्वासन दिया की उन्होंने जो वचन राजा दशरथ से कहा है उसे निभाते समय उनके पैर कभी पीछे नहीं हटेंगे । वो अपने भाई भरत की राज गद्दी के लिए 14 वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकारेंगे । प्रेम, करुणा और दया के महासागर प्रभु श्री राम ने आजीवन भरत की माता कैकेई को अपनी माता से ज़्यादा सम्मान दिया, कभी उनकी उपेक्षा नहीं की । गुरु विश्वामित्र को गुरुओं में सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया, केवट को गले लगाया, अहिल्या को तारा, भीलनी (माता शबरी) का जूठा फल खाया ही कारण है कि भगवान् श्री राम संसार के हर मनुष्य, प्राणी, जाति और समुदाय के लिए एक आदर्श हैं ।
काम, क्रोध, मद, लोभ, सब, नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि, भजहुँ भजहिं जेहि संत।
अर्थ : हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ- ये सब नरक के रास्ते हैं, इन सबको छोड़कर श्री रामचंद्रजी को भजिए, जिन्हें संत (सत्पुरुष) भजते हैं ।