कथा सार एवं संपूर्ण कथा Katha Saar & Story
॥ ॐ बलभद्राय नमः ॥
जब भगवान विष्णु ने द्वापर युग में कृष्ण के रूप में अवतार लेने का संकल्प किया, तब उन्होंने शेषनाग से कहा, “तुम मेरे साथ पृथ्वी लोक चलो। मैं कृष्ण बनूँगा, तुम मेरे अग्रज, बड़े भाई, बलराम बनोगे ।” शेषनाग ने भगवान की आज्ञा मानी और वो सहर्ष तैयार हो गए । वैकुण्ठ में भगवान विष्णु जिस शय्या पर शयन करते हैं, वह नागो में सर्वप्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ शेषनाग ही हैं ।
सनातन हिन्दू धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता है कि उनके सहस्र फनों पर ही यह सम्पूर्ण सृष्टि टिकी हुई है। शेषनाग केवल एक नाग मात्र नहीं हैं, वे भगवान विष्णु (नारायण) की वह महाशक्ति हैं जिसने समस्त सृष्टि को धारण किया है । भगवान शेषनाग की शक्ति और सेवा की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है ।
नमस्ते तू हलाग्राय नमस्ते मुशलायुधा
नमस्ते रेवतीकांत नमस्ते भक्तवत्सल
नमस्ते बलिम श्रेष्ठ नमस्ते धरणी धर
प्रलंबारे नमस्ते तू पाहीमाम कृष्ण पूर्वजा ॥
बलराम (बलभद्र एवं हलधर) की जन्म कथा क्योकि भगवान हरि को श्री कृष्ण का अवतार लेकर कंस के वध के लिए जन्म लेना सुनिश्चित था । इसलिए उनके साथ शेषनाग का भी मानव रुपी स्वरुप में जन्म होना था । भगवान नारायण की योजना के अनुसार शेषनाग ने सबसे पहले माता देवकी के गर्भ में प्रवेश किया । देवकी और वासुदेव के अनुसार यह उनका सातवाँ गर्भ था । छः पुत्रों का वध कंस पहले ही कर चुका था, अब सातवीं बार देवकी गर्भवती हुई थी । देवकी और वासुदेव कंस के कारागार में बंद थे कारागार में इस गर्भ का आना एक नई प्रभा की किरण था । लेकिन साथ ही एक नया भय भी था कि क्या इस बार भी कंस इस बच्चे को मार देगा? देवकी और वसुदेव ह्रदय भय से काँप रहा था । लेकिन इस बार भगवान नारायण की योजना कुछ और ही थी । यह गर्भ कारागार में जन्म नहीं लेगा । यह गर्भ कंस की पहुँच से दूर, गोकुल में जन्म लेगा । इसके लिए एक अद्भुत कार्य होना था जो इससे पहले कभी नहीं हुआ था ।
भगवान हरि ने वैकुण्ठ में जब यह योजना बनाई थी, तब उन्होंने अपनी शक्ति योगमाया को एक विशेष कार्य सौंपा था । वह कार्य था: देवकी के गर्भ में पल रहे शेषनाग के अंश को रोहिणी माता के गर्भ में स्थानांतरित करना। योगमाया ने यह कार्य उसी रात किया जब देवकी के सातवें गर्भ का समय पूर्ण होने वाला था । उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से इस गर्भ को देवकी की गर्भ से निकाला और रोहिणी माता की गर्भ में स्थापित कर दिया । भगवान हरि ने अपनी योगमाया शक्ति को यह आदेश दिया कि “देवकी के गर्भ में जो शेषनाग का अंश है, उसे रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित करो । कंस ये समझेगा कि देवकी का गर्भपात हो गया । लेकिन वह भ्रूण रोहिणी के गर्भ से सकुशल बालक शिशु के रूप में जन्म लेगा।”
बलराम जी की माता रोहिणी कारागार में बंद वासुदेव की दूसरी पत्नी थीं । वे एक धर्मपरायण, शांत और सहनशील स्त्री थीं । जब कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद किया, तब रोहिणी माता पहले ही कंस के अत्याचार से बचने के लिए गोकुल में नंद बाबा के घर चली गई थीं । नंद बाबा और वासुदेव के परिवारों के बीच घनिष्ठ मित्रता थी । इसीलिए रोहिणी माता को गोकुल में आश्रय मिला । वे वहाँ सुरक्षित थीं, कंस की पहुँच से दूर, शांत ब्रज की गोद में । जब नारायण की योगमाया शक्ति ने शेषनाग को रोहिणी माता के गर्भ में स्थापित किया, तो रोहिणी माता को स्वप्न में इसका आभास हुआ । उन्होंने अनुभव किया कि उनके गर्भ में एक दिव्य शक्ति आ गई है । वे और अधिक प्रसन्न और शांत हो गईं ।
भादो माह की कृष्ण पक्ष की षष्ठी के दिन रोहिणी माता के गर्भ से एक दिव्य शिशु ने जन्म लिया । यह शिशु असाधारण था, शरीर की कांति श्वेत वर्ण की थी, नेत्र लाल और बड़े-बड़े थे, उसके जन्म के समय आकाश में दिव्य संगीत गूँज रहा था, नंद बाबा के घर में उत्सव मनाया जाने लगा । दिव्य शिशु के दर्शन के लिए गोकुल के सभी लोग नन्द बाबा के घर आने लगे । यशोदा माता ने उसे अपनी गोद में उठाय तो पूरे गोकुल में आनंद फ़ैल गया । लेकिन यह आनंद केवल एक शिशु के जन्म के लिए नहीं था । यह उस शेषनाग अवतार के जन्म का आनंद क्षण था, जो अनंत काल से भगवान विष्णु की सेवा करते आए थे। इस बार वे पृथ्वीलोक पर भगवान नारायण के कृष्ण अवतार के अग्रज, बड़े भाई बनकर आए थे ।
व्रत विधि Vrat Vidhi
भादो माह कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मातायें अपने पुत्र के कल्याण हेतु "हलछठ का एक दिवसीय व्रत रहती हैं । इस व्रत में पूजा के समय कुछ विशेष चीजें चढ़ाई जाती हैं और मुख्य रूप से महुआ के पत्तों की पूजा की जाती है । इस व्रत में मातायें बिना जोता और बोया हुआ फल-सब्जियाँ वाला आहार ग्रहण करती हैं । इस व्रत में किसी भी तरह के अनाज का सेवन वर्जित है ।
महत्व Significance
मिट्टी के छोटे कुल्हड़ का महत्त्व :
हल छठ की पूजा में मुख्य रूप से मिट्टी के कुल्लहड़ का महत्तव है जिसमें सात तरह के अनाज भरे जाते हैं । इन मिट्टी के कुल्लहड़ों को पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है । गेहूं, जौ, अरहर, मक्का, मूंग, धान आदि चढ़ाया जा सकता है, पूजा में साबुत अनाज ही चढ़ाने चाहिए और इन्हें भूनकर ही चढ़ाया जाता है ।
फल एवं लाभ Spiritual Benefits
हल छठ: इस व्रत को करने से संतान (पुत्र) की दीर्घायु, आरोग्य और सुख-समृद्धि होती है ।