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श्री गणेशाय नमः
रुद्रावतार श्री हनुमान जी
DIVINE PRESENCE

श्री हनुमान जी

श्री राम भक्त महावीर हनुमान जी भगवान शिव के रुद्रावतार हैं । बल, बुद्धि, विद्या और सभी गुणों से संपन्न श्री हनुमान जी सीता और राम के सबसे दुलारे हैं ।

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गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् ।

रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ।।

जिन्होंने महासमुद्र को गाय के खुर के निशान (छोटे से गड्ढे) के समान लाँघ लिया, बड़े-बड़े राक्षसों को मच्छर की तरह मसल कर नष्ट कर दिया, और जो 'रामायण' रूपी महान माला के एक अमूल्य रत्न के समान हैं, उन पवनपुत्र (अनिलात्मज) श्री हनुमान जी की मैं वंदना करता हूँ


एक पौराणिक कथा के अनुसार, श्रृंगी ऋषि के कहने पर जब अयोध्या के राजा दशरथ अपनी पत्नियों के साथ पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे, तो हवन में उन्हें एक विशेष प्रकार की खीर दी गयी । उन्हें कहा गया कि यह विशेष खीर वो अपनी तीनों पत्नियों को खिला दें । हवन समाप्ति के बाद राजा दशरथ ने खीर तीनों रानियों में थोड़ी-थोड़ी बांट दी तभी खीर का एक भाग एक कौआ अपने साथ उड़ा ले गया । कौवे ने खीर वहाँ गिरा दिया जहाँ केसरीनन्दन की पत्नी माता अंजनी एक पर्वत पर तपस्या कर रही थीं ।


तपस्या करती हुई अंजनी माता के हाथ में जब खीर गिरी, तो उन्होंने उसे शिवजी का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लिया । कहते हैं कि इसी प्रसाद की वजह से अयोध्या में भगवान्म श्री राम जी का जन्म हुआ और अंजनी माता के गर्भ से श्री हनुमानजी का जन्म हुआ । इस तरह प्रभु और भक्त दोनों एकसाथ एक ही प्रसाद से इस धरती पर अवतरित हुये और उनका एक अनोखा सम्बन्ध जन्म से ही बन गया ।


हिन्दू सनातन धर्मग्रंथों में हनुमानजी के जन्म को लेकर कई सारी पौराणिक की मान्यता है । उनमें से एक बहुत ही रोचक कथा है। इस कथा के अनुसार, माता अंजनी को यह वरदान मिला हुआ था कि उनका होने वाला पुत्र भगवान्का शिव का अंश होगा और यही कारण है कि हनुमानजी को शिव का अवतार माना जाता है । एक मान्यता यह भी है कि जब हनुमान जी का जन्म हुआ था, तो उसी समय रावण के घर भी एक पुत्र ने जन्म लिया था ।यह महज एक संयोग नहीं था बल्कि यह दुनिया में अच्छाई और बुराई का संतुलन बनाए रखने के लिए हुआ था । यह भी माना जाता है कि ध्यान मुद्रा में भगवान् शिव सदा ही श्री राम का नाम जपते रहते हैं ।


इसलिए शिव जी ने प्रभु राम का दास बनने और उनकी सेवा-सहयोग करने के लिए रुद्रावतार रूप में जन्में और हनुमान कहलाये । मुख्य कारण भगवान राम की मदद: रावण को हराने और माता सीता को ढूंढने में भगवान राम को एक शक्तिशाली, बुद्धिमान और आज्ञाकारी साथी की आवश्यकता थी । हनुमान जी भगवान शिव के ही ग्यारहवें रुद्र अवतार (अंश) हैं, जिन्होंने त्रेतायुग में राम जी की सेवा के लिए जन्म लिया था । हनुमान जी की भगवान्रा राम के प्रति समर्पण ने संसार को यह सिखाया कि बिना स्वार्थ के भगवान की सच्ची सेवा और भक्ति कैसे की जाती है । हनुमान जी की राम भक्ति से प्रसन्न होकर माता सीता ने उन्हें अमरता (चिरंजीवी) का वरदान मिला जिससे कि वे हमेशा पृथ्वी पर प्रभु राम नाम का प्रसार कर सकें ।


'ता कहूं प्रभु कछु अगम नहीं, जा पर तुम्ह अनुकूल,

तव प्रभाव बड़वानलहि, जारि सकइ खलु तूल।'


सबसे बड़ी बात यह है कि कठिन से कठिन और असंभव लगने वाले कार्यों में भी जब हनुमानजी ने विजय प्राप्त की तब भी उन्होंने प्रत्येक सफलता का श्रेय 'सो सब तव प्रताप रघुराई' कहकर अपने स्वामी प्रभु राम को समर्पित कर दिया । यहीं हनुमानजी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है । हनुमानजी का चरित्र अतुलित पराक्रम, ज्ञान और शक्ति के बाद भी अहंकार से विहीन था । यही आदर्श आज हमारे प्रकाश स्तंभ हैं, जो विषमताओं से भरे हुए संसार सागर में हमारा मार्गदर्शन करते हैं ।


अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभदेहं

दनुजवनकृष्णुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्|

सकलगुणनिधानं वानाराणामधीशं

रघुपतिवरदुतं वातजातं नमामि||

अर्थ: मैं हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ, जो अतुलनीय शक्ति के स्वामी, स्वर्णमय शरीर वाले, राक्षसों के लिए अग्नि समान, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, सद्गुणों से परिपूर्ण, वानरों के नेता, राम के दूत और पवनपुत्र हैं ।


अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।

कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥

हनुमान जी माता अंजनी के वीर पुत्र हैं । माता जानकी (सीता जी) के शोक और पीड़ा का नाश करने वाले, वानरों के स्वामी और रावण के पुत्र अक्षकुमार का वध करने वाले हैं । लंका नगरी में भय उत्पन्न करने वाले (लंका को डराने वाले) श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ ।


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मंत्र

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स्तोत्र

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Stotrams

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वंदना

Vandana