वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
भगवान् श्री गणेश “अचिंत्य”, “अव्यक्त” और “अनंत” हैं अर्थात् विचारों से परे, अभिव्यक्ति से परे तथा शाश्वत् हैं । भगवान् श्री गणेश जैसा कोई सुंदर नहीं है और वह सर्वव्यापी हैं सभी गुणों और कलाओं से परिपूर्ण हैं । गणपति को प्रथम पूज्य स्थान इसलिए मिला क्योकि उन्होंने अपने माता पिता प्रदक्षिणा करके पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर ली, उनकी इस भावना ने माता पिता का सम्मान करके सम्पूर्ण जगत को यह सन्देश दिया के मात्र-पितृ ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता है और वो ही सर्वोपरि हैं । भगवान गणपति का पूजन सभी देवताओं के पूजन से पहले करने का विधान है, अर्थात वह देवों अग्रणीय है, गणपति का आह्वान करने के बाद ही यज्ञ, पूजा, धार्मिक अनुष्ठान, शुभ कार्य का आरंभ किया जाता है । गणपति भगवान विघ्न विनाशक हैं, सुबुद्धि प्रदान करने वाले हैं अर्थात किसी भी कार्य को निर्विघ्न पूरा करने की सम्पूर्ण क्षमता सिर्फ भगवान् गणेश जी के पास ही है ।
अवतरणकी कथा :
भगवान् गणेश का जन्म माता पार्वती के शरीर से निकले मैल से हुआ है । एक बार भगवान शिव और माता पार्वती अति उत्साह में लीन हो कर उत्सव मना रहे थे । इस प्रयोजन में पार्वती के शरीर पर कुछ मैल जम गई । माता पार्वती ने अपने शरीर से उस मैल को हटाकर उसका एक गुड्डा बनाया । फिर उन्होंने उसमें प्राण फूंके और उस गुड्डे को द्वारपाल के रूप में खड़ा करके स्नान करने अंदर चली गईं ।
जब भाग शिव अपनी साधना को विराम देकर कैलाश पर्वत पर आए तो उन्होंने देखा द्वार पर एक बालक खड़ा है जो उन्हें पहचान नहीं पा रहा है । जिस कारण वो भगवान् शिव को उनका अंदर जाने का मार्ग नहीं दे रहा है और उन्हें रुकने के लिये कह रहा है । बालक के हठ के कारण भगवान् शिव को क्रोध आ जाता है और वो उस बालक का सिर काट कर अंदर प्रवेश कर जाते हैं ।
जब पार्वती माता भगवान् शिव को अंदर देखती है तो उन्हें ज्ञात होता है कि द्वार पर क्या हुआ । वो भगवान शिव से प्रार्थना करती है कि वह बालक तो उनका पुत्र था इसलिए शिव को उसे बचाना होगा । तब भगवान शिव ने अपने सेवकों को किसी ऐसे जीव को ढूँढ कर, जिसका सिर उत्तर दिशा की ओर हो, जिसका ऊर्जा प्रवाह ऊर्जा के प्राकृतिक प्रवाह संग सामंजस्य में हो, उसका सिर लाने को भेजते हैं । सेवकों ने बहुत दूर तक जा कर प्रयास किया किंतु वे भगवान शिव द्वारा बताई गई अवस्था में केवल एक हाथी को ही ढूँढ पाए । अतः वे उसी हाथी का सिर काट कर ले आते हैं, और इस प्रकार भगवान् गणेश की गजमुख के साथ उत्पत्ति होती हैं जिसे सम्पूर्ण संसार पूजता है ।
गणेश जी एकदन्त कहलाये:
भगवान् गणेश के एकदन्त होने की विभिन्न कथायें हैं, कहा जाता है । एक बार भगवान् परशुराम कैलाश पर्वत भगवान शिव से मिलने के लिए आये । लेकिन द्वार पर खड़े गणेश जी ने भगवान् परशुराम को अंदर जाने से रोक दिया । भगवान् परशुराम ने गणेश जी से अनेकों विनती की लेकिन वो नहीं माने अंततः परशुराम ने गणपति को युद्ध की चुनौती दी । गणेश जी युद्ध करने के लिये तैयार हो गए और युद्ध में परशुराम के फरसे के वार से उनका एक दांत टूट गया और वे एकदंत कहलाने लगे ।
एक कथा के अनुसार गणेश जी बचपन में बहुत उत्पाती और चंचल थे जबकि अग्रज बड़े भाई कार्तिकेय जी बहुत ही सरल और शांत स्वभाव के थे । दोनों भाईयों के विपरीत स्वभाव के चलते भगवान् शिव-देवी पार्वती बहुत चिंतित रहते थे, क्योंकि गणेश जी कार्तिकेय के साथ असाधारण ठिठोली करते थे । एक दिन कार्तिकेय जी ने भगवान गणेश को सबक सिखाने का निश्चय किया और उन्होंने गणपति की पिटाई कर दी जिससे उनका एक दांत टूट गया और तभी से भगवान गणेश एकदंत कहलाये ।
महाभारत की कथा के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत लिखने के समय भगवान् गणेश के सामने ये शर्त रखी थी कि वो बोलना बंद नहीं करेंगे, वे लगातार बोलेंगे और वो बिना रुके लिखते रहेंगे । ऐसे में गणेश जी ने अपना एक दांत स्वयं ही तोड़कर उसे कलम बना लिया । महाभारत काल से ही वे एकदंत कहलाये जाने लगे।
गणेश जी के 12 प्रमुख नाम (द्वादश नाम):
1.सुमुख
2.एकदंत
3.कपिल
4.गजकर्णक
5.लंबोदर
6.विकट
7.विघ्ननाश (विघ्ननाशक)
8.विनायक
9.धूम्रकेतु
10.गणाध्यक्ष
11.भालचंद्र
12.गजानन