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श्री गणेशाय नमः
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भगवान विष्णु जी की आरती...

यह आरती भारत ही नहीं संसार भर के हिंदू घरों और मंदिरों में सबसे अधिक गायी जाने वाली आरती है । यह आरती भगवान विष्णु जगदीश (ब्रह्मांड के स्वामी) को समर्पित है ।

ॐ जय जगदीश हरे...

भगवान विष्णु जी की आरती... ॐ जय जगदीश हरे...

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे। भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥ जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का। सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥ मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥ तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥ पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥ तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥ तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥ दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥ विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥ तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥ जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥ रचना : "ॐ जय जगदीश हरे" आरती की रचना पंजाब के संत-कवि पंडित श्रद्धा राम फिल्लौरी ने की थी । इस आरती को लिखने का आशय ये था कि सामान्य भक्त जटिल संस्कृत के बजाय सरल, हृदयस्पर्शी हिंदी में ईश्वर की स्तुति कर सकें । चूँकि इसके शब्द परमात्मा श्री भगवान् विष्णु के गुणों का वर्णन करते हैं - जो दुख हरने वाले है, भक्तों के रक्षक हैं, सबके दाता हैं, संसार को चलाने वाले हैं - वे दिव्य के किसी भी प्रिय रूप पर लागू होते हैं । यही कारण रहा कि "ॐ जय जगदीश हरे" आरती लगभग हर घर तक पहुँची और हर जगह पूजा, सत्संग व भजन सभाओं के अंत में गया जाने लगा ।